Rakshabandhan Greetings

राखी की हार्दिक शुभकामनाएं !!!

Raksha Bandhan Lekh In Hindi

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Raksha Bandhan Lekh In Hindi

शाश्वत स्नेह और सुरक्षा की दृष्टि से आश्वस्त करने वाला यह त्योहार भाई-बहन के प्रेम का साक्षी एक पवित्र साँस्कृतिक त्योहार है । यों यह मुख्य रूप से हिन्दू जाति और धर्मावलम्बियों के घरी में ही मनाया जाता है; पर अन्य जातियो के व्यक्तियों को भी राखी बान्धते बन्धवाते पूर्व इतिहास में तो देखा ही गया है, आजकल भी अक्सर दिखाई दे जाया करता है । कई बार हिन्दू बहनें किसी मुस्लिम या अन्य जाति-वर्ग के भाई को राखी बान्धती हुई दिखाई दे जीती हैं ।

इसी प्रकार हिन्दू भाई अन्य जाति की बहनो से आग्रहपूर्वक पवित्र राखी के धागे कलाई पर बन्धवा कर उनके प्रेम और सुरक्षा का दायित्व अपने-आप पर लेते हुए सुने-देखे जाते हैं । इस प्रकार प्रमुख रूप से वह बहन-भाई के पवित्र प्रेम और अटूट रिश्ते-नाते को रूपायित करने वाला त्योहार ही है ।  रक्षाबन्धन या राखी का यह पर्व कब, क्यों और किस प्रकार आरम्भ हुआ, पुराण-इतिहास में इस का कोई स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता । ही, विशेष अवसरो पर वहाँ पुरोहितो द्वारा अपने यजमानो की दाहिनी कलाई मे रक्षा या मंगल कामना करते हुए एक मौलिसूत्र बाँधने का वर्णन या विधान अवश्य मिलता है ।

बाद में यह विधान भी मिलने लगता है कि हिन्दू राजा और सामन्त आदि जब युद्ध करने जाया करते थे, तब उनकी माताएँ, बहनें और पत्नियाँ उनके माथे पर अक्षतकुंकुम का केसर लगा कर एक मौलि सूत्र उन की विजय एवं मंगल-कामना करते हुए अवश्य बाँध दिया करती थीं । अनुमान होता है कि इसी रीति ने धीरे-धीरे विकास कर के रक्षाबन्धन का स्वरूप धारण कर लिया होगा । बाद में शान्ति काल में इस का विधान केवल भाई-बहनों तक ही रूढ एवं सीमित हो कर रह गया होगा । आज रक्षाबन्धन का त्योहार बहनो द्वारा अपने भाईयों की कलाइयों पर सुन्दर-संजीली राखियाँ बान्धने. बदले में कुछ धन पाने तक ही सीमित होकर रह गया है । ही, पुजारी-पुरोहित भी इस दिन अपने यजमानों की कलाई पर लालसूत्र बाँध कर बदले में कुछ दक्षिणा प्राप्त करते हुए आज भी दिखाई दे जाते हैं ।

इसे मात्र परम्परा को निबाहे जाना ही कहा जा सकता है । कभी राखी के कच्चे धागों के बन्धन के प्रभाव एवं शक्ति को अचूक माना जाता था, इस तथ्य में तनिक भी सन्देह नहीं । इतिहास इस बात का जीवन्त गवाह- है कि जब कभी भी किसी जातीय या विजातीय भाई को किसी बहन ने राखी भिजवाई, उसे पवित्र प्रेम का अमर- निश्छल निमंत्रण मान कर उस भाई ने अपने दुःख-सुख, संकट-विपदा आदि की परवाह किए बिना प्राण-पण की बाजी लगा कर मुँह बोली बहन के वचन की रक्षा के लिए अपने सर्वस्व की बाजी लगा दी । चित्तौड के महाराणा संग्राम सिंह की मृत्यु के बाद जब सुल्तान बहादुरशाह ने चारों ओर से चित्तौड गढ को घेर लिया था, तब अपने-आप को नितान्त असहाय पाकर महारानी कर्मवती ने शहनशाह हुमायूँ को राखी भिजवा कर अपने राज्य की रक्षा के लिए मौन निमंत्रण दिया ।

राखी की पवित्रता और महत्त्व को समझने वाले हुमायूँ स्वयं शेरशाह सूरी के आक्रमणो से आतकित रहने पर भी मुँहबोली बहन कर्मवती के चित्तौड की रक्षा के लिए भागे आए थे । यह ठीक है कि समय पर न पहुँच पाने के कारण वे चित्तौड को पराजित होने और कर्मवती को जौहर की ज्वाला में जल मरने से बचा नहीं पाए, पर बाद में बहादुर शाह को पराजित कर और मेवाड के असली वारिस (उदयसिंह) को उसके राज्य पर अधिष्ठित करवा कर उन्होने राखी का मोल भरसक चुका दिया । इस प्रकार इस ऐतिहासिक घटना ने रक्षाबन्धन जैसे पवित्र पर्व का महत्त्व निश्चय ही और बढ दिया ।

आज भी रक्षाबन्धन का पर्व आने पर बाजार रंग-बिरंगी राखियों से भर जाते हैं । राखी खरीदने वाली बहनो की बाजारों में भीड-भाड भी काफी रहा करती है । मिठाइयों की दुकानें और स्टील भी भरे-पूरे एवं सजे-धजे रहा करते हैं । वहाँ भी खूब खरीददारी होती है । रक्षाबन्धन वाले दिन सजी-धजी बहनों की भीड घरों, बाजारों, बसों, स्कूटरों, कारों आदि में अपनी-अपनी हैसियत के साथ सर्वत्र देखी-परखी जाती है । लेकिन अब यह सब मात्र एक परम्परा का निर्वाह, एक औपचारिकता बनकर ही अधिक रह गया है । आज राखी बान्धने के बाद बहनें गिनती करती हैं कि उसके भाई ने उसे कितने नोट आदि दिए । यह देखती भी हैं कि उसने अपनी हैसियत और उस (बहन) के स्टेटस के अनुसार दिया है कि नहीं ।

विवाहित बहनों से पतियों -सासों आदि द्वारा पूछा-परखा जाता है कि राखी बाँध कर वह कितनी उगाही कर लाई है । स्पष्ट है कि इस प्रकार की पूछ-ताछ और जाँच-परख बहन-भाई के पवित्र स्नेह बन्धन की कसौटी, होकर हैसियत जानने-देखने की कसौटी ही हुआ करती है । इसी कारण आज रक्षाबन्धन का पावन त्योहार भी अन्य सभी त्योहारों की तरह एक लकीर को पीटे जाना ही प्रतीत होने लगा है और उचित ही लोग इस तरह की औपचारिकताओं का विरोध करने लगे हैं । ठीक डग और सच्चे मन से मनाए जाकर ही पर्व और त्योहार किसी जाति की साँस्कृतिक जीवन्तता के प्रतीक एवं परिचायक बने रहा करते हैं ।

त्योहारों के अवसरो पर व्यक्त परम्पराओं और रीति-नीतियों के उचित निर्वाह से ही किसी संस्कृति के उदात एवं सात्विक गुण भी उजागर हो पाया करते हैं । अत: यदि हम लोग रक्षाबन्धन की पावन अंतरंगत एवं साँस्कृतिक उच्चता को ध्वस्त नहीं होने देना चाहते, तो हमें उसमें आ गई औपचारिकता का निराकरण करना ही होगा ।

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Updated: August 16, 2016 — 4:53 pm

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